क्रायोजेनिक इंजन में भारत हुआ आत्मनिर्भर

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने विश्व में क्रायोजेनिक इंजन अंतरिक्ष में भेजने के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बना दिया है।

आत्मनिर्भर

भारत समेत आज केवल छह देश हैं। अभी तक हम रूस से आयात कर रहे थे। रूस ने हमें छह इंजन अवश्य दिए थे पर तकनीक हस्तांतरित नहीं कर रहा था, इसलिए भारत ने इसे स्वयं तैयार कर लिया।

छठवां देश

यह इंजन पृथ्वी की निचली कक्षा में 6000 किग्रा. तक और ऊपरी में इसका एक तिहाई भार ले जा सकता है। यह एक साथ 100 से 200 उपग्रह आसानी से अंतरिक्ष में ले जा सकता हैं।

उपग्रह

चार दशक तक स्वदेशी इंजन तैयार करने के संघर्ष के बाद हमने हाल ही में तीसरी पीढ़ी का मौसम संबंधी उपग्रह इनसेट 3डी एस को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया है।

संघर्ष

क्रायोजेनिक इंजन में तरल गैसों के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है जो ढोए जा रहे भार को तीव्र गति प्रदान करता है। ये रॉकेट ज्यादा भार को तेजी से ऊपर ले जाते हैं।

क्या करता है ?

अंतरिक्ष कार्यक्रम को बल मिलेगा। मंगल, चंद्र आदि अभियानों की जटिलताएं कम होंगी। सैन्य क्षमताओं को नए आयाम मिलेंगे। वैश्विक उपग्रह कारोबार में भी हमारी हिस्सेदारी बढ़ेगी।

लाभ

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